ये अन्धेरा अब पिघलना चाहिये
सूर्य बादल से निकलना चाहिये
कब तलक परहेज़ होगा शोर से
अब हमारे होँठ हिलना चाहिये
फुसफुसाहट का असर दिखता नहीँ
हमको अपना स्वर बदलना चाहिये
अब नहीँ काफी महज़ आलोचना
आग कलमोँ को उगलना चाहिये
ये नक़ाबेँ नोचने का वक़्त है
हाथ चेहरोँ तक पहुंचना चाहिये
वक़्त भी कम है हमारे हाथ से
अब न ये मौक़ा फिसलना चाहिये.
-डा. अरविन्द चतुर्वेदी
फिर फिर से ....
5 वर्ष पहले